ढोल–नगाड़ों की गूंज के साथ सड़कों पर उतरे भूमिहीन, आशियाने पर खतरे के खिलाफ मझौलिया में बड़ा आंदोलन।
बेतिया से वकीलुर रहमान खान की ब्यूरो रिपोर्ट।
मझौलिया (पच्छिम चम्पारण)
पश्चिम चंपारण जिले के मझौलिया प्रखंड में सोमवार का दिन भूमिहीन परिवारों के आक्रोश और संघर्ष की आवाज़ बनकर सामने आया। सरकार और प्रशासन द्वारा भूमिहीन परिवारों को हटाने से संबंधित नोटिस जारी किए जाने के विरोध में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के बैनर तले सैकड़ों भूमिहीन महिला–पुरुष ढोल–नगाड़ों और लाल झंडों के साथ सड़कों पर उतर आए। पूरे इलाके में आंदोलन की गूंज सुनाई दी और माहौल पूरी तरह संघर्षमय नजर आया।
प्रदर्शनकारियों को प्रशासन की ओर से 30 दिसंबर तक का समय देते हुए नोटिस दिया गया था। इसी के विरोध में भूमिहीन परिवार मझौलिया हाई स्कूल परिसर से संगठित होकर मार्च करते हुए प्रखंड कार्यालय पहुंचे। हाथों में लाल झंडे, नारों की गूंज और ढोल–नगाड़ों की आवाज़ के बीच प्रदर्शनकारियों ने सरकार की कथित बुलडोजर नीति के खिलाफ जोरदार विरोध दर्ज कराया। मार्च के दौरान “भूमिहीनों को बसाओ”, “गरीबों के आशियाने बचाओ” और “बिना पुनर्वास नहीं होगा विस्थापन” जैसे नारे लगातार गूंजते रहे।
कड़ाके की ठंड के बावजूद आंदोलन में महिलाओं की बड़ी और प्रभावशाली भागीदारी देखने को मिली। महिलाएं अपने छोटे बच्चों के साथ सड़कों पर उतरीं और साफ शब्दों में कहा कि यह लड़ाई सिर्फ जमीन की नहीं, बल्कि उनके सम्मान, सुरक्षा और भविष्य की है। महिलाओं का कहना था कि वर्षों से जिस छत के नीचे उन्होंने जीवन गुजारा है, उसे बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के उनसे छीना नहीं जा सकता। उनका स्पष्ट संदेश था कि वे अपने आशियाने की रक्षा के लिए हर स्तर पर संघर्ष करेंगी।
प्रदर्शन के दौरान नेताओं और भूमिहीनों ने आरोप लगाया कि कई गरीब परिवार पिछले 80 से 100 वर्षों से उक्त जमीन पर बसे हुए हैं। पीढ़ियों से रह रहे इन परिवारों के लिए यह जमीन सिर्फ जमीन नहीं, बल्कि उनकी पहचान और जीवन का आधार है। ऐसे में बिना पुनर्वास की ठोस योजना बनाए नोटिस जारी करना और हटाने की तैयारी करना पूरी तरह अन्यायपूर्ण बताया गया। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि सरकार को पहले गरीबों के पुनर्वास की जिम्मेदारी निभानी चाहिए, उसके बाद किसी निर्णय पर विचार होना चाहिए।
प्रखंड कार्यालय परिसर में हुई सभा को संबोधित करते हुए भाकपा नेताओं ने प्रशासन को स्पष्ट चेतावनी दी। नेताओं ने कहा कि यदि भूमिहीनों के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की गई, तो आंदोलन को और व्यापक तथा तेज किया जाएगा। उन्होंने मांग रखी कि प्रत्येक भूमिहीन परिवार को कम से कम तीन डिसमिल जमीन और पक्का मकान उपलब्ध कराया जाए, ताकि गरीब परिवार सम्मानजनक जीवन जी सकें। बिना इस व्यवस्था के किसी भी प्रकार का दबाव स्वीकार नहीं किया जाएगा।
सभा के दौरान जिला नेता कामरेड ओमप्रकाश क्रांति, किसान नेता राधा मोहन यादव, कामरेड अब्दुल सत्तार, कामरेड अशोक मिश्र और कामरेड कृष्णनंदन सिंह सहित कई नेताओं ने सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े किए। नेताओं ने कहा कि गरीबों को उजाड़ने की जगह सरकार को उनके स्थायी समाधान पर काम करना चाहिए। उन्होंने दो टूक कहा कि भूमिहीनों की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता और यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा, जब तक न्याय नहीं मिल जाता।
हालांकि पूरा प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन प्रशासन और सरकार के प्रति गहरा असंतोष साफ तौर पर नजर आया। लोगों की आंखों में डर भी था और संघर्ष का संकल्प भी। मझौलिया की सड़कों पर उतरा यह आंदोलन साफ संकेत दे गया कि भूमिहीन अपने आशियाने, अपने हक और अपने भविष्य की लड़ाई पीछे हटकर नहीं, बल्कि डटकर लड़ने को तैयार हैं।
