लोकतंत्र के आईने में एक किशोर आश्वामित गौतम की आवाज़
प्रधान संपादक, ललन कुमार सिन्हा
लखनऊ का 14 वर्षीय किशोर आश्वामित गौतम आज उन सभी के लिए एक मिसाल बन गया है, जो व्यवस्था की खामियों पर चुप्पी साधे रहते हैं। इंस्टाग्राम जैसे डिजिटल मंच पर 6 लाख से अधिक लोगों की आवाज़ बन चुका यह दलित किशोर आज सवाल पूछने की वजह से सत्ता के निशाने पर है।
आश्वामित कोई साधारण व्लॉगर नहीं है। उसकी सोच की जड़ें शहीद-ए-आजम भगत सिंह के क्रांतिकारी साहस, धरती आबा बिरसा मुंडा के संघर्ष, महात्मा ज्योतिबा फुले के सामाजिक सुधार और बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के संवैधानिक मूल्यों में दिखाई देती हैं।
जब एक नाबालिग इन महापुरुषों के विचारों को पढ़कर राष्ट्रहित, समानता और न्याय की बात करता है, तो उसे खतरा नहीं बल्कि लोकतंत्र की उम्मीद के रूप में देखा जाना चाहिए।
गंभीर सवाल यह है कि जो सरकार एक 14 साल के बच्चे द्वारा उठाए गए सवालों का लोकतांत्रिक तरीके से जवाब नहीं दे पा रही, वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के सम्मान से जुड़े मुद्दों पर कितनी मजबूती से खड़ी हो पाएगी?
क्या आज का भारत सवाल पूछने से डरने लगा है?
क्या भगत सिंह और डॉ. अंबेडकर के विचारों पर बोलना अब इतना असहज कर देने वाला हो गया है कि एक किशोर पर कार्रवाई के आदेश जारी किए जाने लगें?
इतिहास गवाह है कि जब-जब हाशिए के समाज से कोई आवाज़ उठी है, उसे दबाने की कोशिश की गई है। आश्वामित का मामला भी उसी परंपरा की याद दिलाता है, जहाँ तर्क और संवाद के स्थान पर दमन को चुना जाता है।
यह मामला केवल एक किशोर की अभिव्यक्ति का नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की सेहत से जुड़ा सवाल है।
यदि आज हम एक बच्चे की आवाज़ के लिए खड़े नहीं होते, तो कल सवाल पूछने वाली हर ज़ुबान को खामोश कर देना आसान हो जाएगा।
लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है कि वह असहज सवालों को कितनी सहनशीलता के साथ स्वीकार करता है—न कि उन्हें दबाकर अपनी ताकत का भ्रम पालता है।
