चम्पारण के चीनी मिलों की उत्पादन क्षमता बढ़े, तभी बचेगी चंपारण की चीनी अर्थव्यवस्था।

चम्पारण के चीनी मिलों की उत्पादन क्षमता बढ़े, तभी बचेगी चंपारण की चीनी अर्थव्यवस्था।

Bettiah Bihar West Champaran

चम्पारण के चीनी मिलों की उत्पादन क्षमता बढ़े, तभी बचेगी चंपारण की चीनी अर्थव्यवस्था।

लौरिया से राजा मिश्रा के सहयोग से बेतिया से वकीलुर रहमान खान की‌ ब्यूरो रिपोर्ट।

लौरिया (पच्छिम चम्पारण)
चंपारण की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली एचपीसीएल चीनी मिल लौरिया एवं सुगौली की उत्पादन क्षमता बढ़ाना अब केवल मांग नहीं, बल्कि समय की अनिवार्यता बन चुकी है। वर्ष 2010-11 में अत्याधुनिक तकनीक के साथ शुरू हुई इन दोनों मिलों की पेराई क्षमता आज भी 3530 टीसीडी पर अटकी हुई है, जबकि वर्तमान दौर में यह क्षमता नाकाफी साबित हो रही है।
आज जब निजी क्षेत्र की अधिकांश चीनी मिलें 8,000 से 10,000 टीसीडी की क्षमता के साथ काम कर रही हैं, तब सरकार के स्वामित्व वाली ये मिलें पीछे छूटती नजर आ रही हैं। उत्पादन क्षमता कम रहने का सीधा असर लागत, मुनाफा और किसानों की सुविधा पर पड़ता है। यही वजह है कि बिहार की कई चीनी मिलें समय के साथ खुद को आधुनिक नहीं कर पाईं और घाटे में जाकर बंद हो गईं।
चंपारण में गन्ना ही किसानों की मुख्य नगदी फसल है। हजारों परिवारों की आजीविका इसी पर निर्भर है। किसान वैज्ञानिक पद्धति से खेती कर उत्पादन बढ़ा रहे हैं, लेकिन मिलों की सीमित क्षमता उनके लिए नई परेशानी बन गई है। पेराई में देरी, गन्ना उठाव में समस्या और भुगतान में विलंब जैसी स्थितियां अक्सर सामने आती हैं।
पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश का चीनी उद्योग मॉडल इस दिशा में एक उदाहरण है, जहां उत्पादन क्षमता बढ़ाकर लागत और उत्पादन के बीच संतुलन बनाया गया है। यदि लौरिया और सुगौली मिलों की पेराई क्षमता 7500 टीसीडी कर दी जाए, तो न केवल ये मिलें आत्मनिर्भर बनेंगी, बल्कि किसानों को भी समय पर गन्ना बेचने और भुगतान पाने में राहत मिलेगी।
साथ ही, ये दोनों प्लांट केवल चीनी ही नहीं, बल्कि इथेनॉल और बिजली उत्पादन भी करते हैं। ऐसे में इनकी क्षमता बढ़ाना राज्य और देश की ऊर्जा नीति के लिहाज से भी फायदेमंद होगा।
अब जरूरत है ठोस फैसले की। यदि समय रहते उत्पादन क्षमता नहीं बढ़ाई गई, तो आने वाले वर्षों में इसका खामियाजा किसानों और पूरे क्षेत्र को भुगतना पड़ सकता है।

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